दिल्ली के दिल से दूर…

दिल्ली के दिल से दूर,

दिल्ली के शोर से दूर,

दिल्ली कि गर्मी से दूर,

इसी गर्मी में पिघलते, घुलते

हम जैसे लोगों की पहुंच से दूर,

सच कहूं तो पहुंच ही नहीं

हमारी समझ से भी बहुत दूर,

कुदरत का एक पहलू है,

एक जंगल है,

जो घुट-घुट कर जी रहा है।

चारों ओर से शायद कट भी रहा है।

हर 2 मिनट में हवाई जहाजों की

भारी, नजरअनदाज ना की जाने वाली आवाजें,

उसे सोने नहीं देती,

वो तो न जाने कब से सोया ही नहीं है,

आते जाते हवाई जहाज उसे जगाये जो रखते हैं।

फिर भी, अपने अंदर

वो ना जाने कितनी ही खूबसूरत चीजें समेटे बैठा है।

पूरी दिल्ली के पंछी यहीं आ बसें हैं,

इसके शहरी जंगल से,

सन्नाटे की खोज में ओझल, बहु-विचलित

सारी तितलियां मानों उड़, यहां दूर भाग आईं हैं।

ये तितलियां कुछ सौ के गुटों में

छोटे छोटे पेड़ों पर बैठ

जी रही हैं,

इन्हें खामोशी की तलाश है।

पर वो खामोशी इन्हें,

इस सुकून से भरे जंगल में भी

सिर्फ कुछ पलों के लिए ही मिलती है

क्योंकि,

हर 2-3 मिनटों उपरान्त

भारीभरकम, शोर मचाने वाले हवाई जहाज 

इन्हें आकुल जो कर देते हैं।

उन हर 2-3 मिनटों के बीच के उस सन्नाटे में, न जाने

कितने पंछी अपने गीत गा देते हैं।

न जाने कितने मोर, अपनी आवाज एक दूसरे तक पहुंचा देते हैं,

न जाने कितनी अनगिनत कोयले पीहू-पीहू कर

हवा में रुहानियत भर देती हैं।

उनकी इसी कूक ने तो मानों जैसे, हर पल मरते

इस जंगल की रूह को जिन्दा रखा है।

उन्हीं 2-3 मिनटों के बाद, पुनः शोर से विक्षुब्ध ये तितलियां,

अस्त व्यस्त हो इधरउधर भागती हैं,

ठिकाना ढूंढती हैं।

अपने कोमल पंखों से आसपास का

मुआयना कर, ये तितलियां

फिर शान्त हो बैठने की कोशिश करती हैं।

उसी सन्नाटे को ढूंढती हैं।

सन्नाटे को परख जब ये वापस बैठ जाती हैं,

शान्त हो जाती हैं।

तभी फिर, दूर ऊपर खुले आसमान में एक हवाई जहाज

शोर मचाता, चीखता चिल्लाता

चारों ओर फैल चुके सन्नाटे को चीरता हुआ निकल जाता है ‍।

और ये नन्ही, कोमल तितलियां फिर व्याकुल हो

अपने उसी सन्नाटे की खोज में जुट जाती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है मानों,

प्रण लिया हो हवाई जहाजों ने,

इन तितलियों को जीवन भर उत्तेजित रखने का ।

हर मुमकिन प्रयास इनके जीवन को अशांत रखने का।

हर कोशिश इनके भावों से खेलने की।

घुट-घुट कर जी रहा ये जंगल,‍

धीरे-धीरे घुट-घुट कर अब मर रहा है,

दम तोड़ रहा है

गुहार लगा रहा है,

हमें कोस रहा है,

दम तोड़ रहा है।

The jungle being referred to is the ‘Aravali biodiversity park’ in Vasant Kunj, New Delhi. 

Forests need us today. More than ever before. They may seem green, but they are dying. A death with every breath we breath. You don’t have to go and hug a tree to save environment, all you have to do is to put a control on your consumption. By consumption, I don’t mean food, but every other thing you buy with money. Ask your self if you need that new bag, new shirt, new glasses because if you don’t, then this small wise decision will save environment in the long run. Start Today! 

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