ये मुझसे आगे जाएगा…

मैंने हमेशा सोचा है,

क्यों मैं उनके ख़्वाब बुनूँ?

क्यों मैं उनकी सोच सजूँ?

क्यों मैं उनके कहे चलूँ?

क्यों मैं उनकी रीत रचूँ?

क्यों?

 

आख़िर मेरी भी इच्छा है;

मेरी भी तो जिज्ञासा है।

मेरे अपने कुछ क़िस्से हैं,

जो मुझे ही के हिस्से हैं।

फिर मैं क्यों कोई बोझ सहूँ?

क्यों मैं उनकी बात सुनूँ?

 

मैंने सोच लिया था,

बेटा केवल अपनी सुनना।

न तू किसी के भ्रम में गुमना।

ये उनकी मोहमाया है,

जो जीवन जी न पाया है।

तू बेफ़िक्र चलना,

बेशक कभी न वापस मुड़ना।

 

उस सूरज ने सब जग देखा है,

तू सब जग से किरणें चुनना,

हर पग तू बस आगे बढ़ना,

बेशक कभी न पीछे मुड़ना।

 

(फिर हमने)

ख़ुद से जब ये बात कही,

दिल में एक आस जगी

जब नहीं किसी ने रोका है,

तो जग सारा इक मौका है।

 

बस फिर क्या था

निकाल पड़ा मैं,

मनमानी करने।

सारे जग को अपना करने।

जग ये सारा शीतल था,

आसमान में पीतल था।

 

बीच गली इक ग़ज़ल बनी

जब मुझको,

निर्झर बहती पवन मिली।

ख़ुशी से महका आलम था,

बस उसका आना रहता था।

वो भी आए,

संग अपने और भी रंग लाए,

झूमता, झिलमिलाता, ख़ुशनुमा तराना था,

ज़िंदगी अब जैसे एक गाना था।

 

छोड़ दिया था हमने

दूजों की सुनना,

और दूजों की माँगे भरना।

फिर हमने एक शोर सुना;

फिर हमने एक शोर सुना,

जो शोर नहीं मानो एक गाना था,

जिसे गा रहा एक नन्हा मुन्ना तराना था।

 

उसे गोद में उठा आँखें भर आयीं,

और दूजे पल,

मुझ ही ने अंदर से आवाज़ लगायी

ये मेरी परछायी होगा,

इस सा और ना कोई दूजा होगा।

ये मेरी परछायी होगा,

इस सा और ना कोई दूजा होगा।

ये मेरे ख़्वाब सजाएगा,

ये मुझसे आगे जाएगा।

 

This post has been penned down as a part of the Blogchatter weekly prompt ‘Write what your heart writes’. So, story behind the poem is:

There is a poet I follow on Instagram and one day he posted a picture of his newborn son saying ‘He will travel to all the places, I didn’t’.

Now, there are few things over which, me and my father have always had issues and one of them is paying too much importance to tomorrow. I am a ‘life is here’ person and he is ‘think about tomorrow’ person.

To be honest, that post of his brought me at peace. In a second, I swear I am not exaggerating but in a split second, I understood as to why my father was so adamant about few things, which I do not approve. Because he himself had a dream. Just because he couldn’t fulfil  his, he wants me to go ahead and do it. Right before that moment I always thought ‘why does he have to pressurise me so much’, but that one line caption made me understand that it’s nothing but love. A fathers love, to see his daughter going places. I never said or shared this little incident with him but then thought it was worth penning something down. Therefore ‘writing what the heart wanted to write’.

Million Thanks for dropping by! Each of you count. 😀